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Ayurveda.

Ayurveda is the ancient science for human. Life in Ayurveda conceived as the union of body, mind, senses and soul. The basic fundamentals is that The body is conglomeration of three humors(dosha – Vata, Pitta, kaph), seven Dhatu(tissues) [as Rasa(serum), Rakta(blood), Mansa(musles), Meda(fats), Asthi(bone), Majja(nerve), Shukra(semen)] and Mala a waste products as faeces, urine and sweat.

Ayurveda The Sanskrit word meaning the ‘Knowledge about life and for Prolonging life. This old holistic medical system now wildly practiced in world especially in India. Ayurveda treats not merely the symptoms of the ailment or the ailments itself, but the body as a whole. It places great importance on the harmony of mind, body, spirit and acknowledges. The psychosomatic cause behind many diseases, Ayurveda looks the whole body, mind and digestion mainly. Disease is regarded as symptoms of imbalance of Three Dosha’s, So, to balance perfectly is a treatment of disease!

Regimen of Seasons - रुतुचर्या -

Regimen of Winter Season - हेमंत चर्या -

आहार - ठण्ड अधिक रहने के कारण स्वस्थ मनुष्यों के शरीर में जठराग्नि बलवान होकर भारी और अधिक खाने को पचाने में समर्थ रहती है | प्रबल जठराग्नि को अगर बल के अनुसार इंधन - भारी और ज्यादा खुराक नहीं मिलेगा तो वही प्रबल जठराग्नि शरीर की प्रथम धातु रस को जला डालती है अत: वायु का प्रकोप होता है और धातुक्षय की बीमारी उत्पन्न हो जाती है | अत: अगर हमें वायु के प्रकोप और धातुक्षय से बचना है तो हमारी प्रबल जठराग्नि के बल के अनुसार खाना खाना पड़ेगा | जैसे, दहीं, मलाई, रबड़ी, मेथीपाक, सलामपाक, मुसलीपाक, गुन्दरपाक, शुद्ध घी के लड्डू, बदामपाक, काजुकतरी, अड़दियापाक, खजुरपाक, च्यवनप्राश, केसरपाक, अद्रकपाक, सुंठपाक, तिल-गुड के लड्डू, तिल-गुड का कचरिया, नए चावल का भात, दाल-बाटी, घी के परोंठे, आदि आदि |

हेमंत रुतु में विहार - शिरोभ्यंग - शिर पर तैल लगाना, सर्वांग अभ्यंग - पुरे शरीर पर तैल लगाना, सर्वांग मर्दन - पुरे शरीर को तैल से मसलना, उत्सादन - पुरे शरीर पर उबटन अर्थात अगर का पाउडर, चने का आटा, चन्दन, त्रिफला, उड़द का आटा, आदि से मलना, पुरे शरीर को शेकना, स्टीम-बाथ लेना, सुबह में सूर्य के ताप का सेवन करना, गरम किये हुए घर में रहना या अपने रूम को गरम करना, उन के गरम कपडे पहनना, रुई की मोटी र्रजई और गद्दे या गरम कम्बलों में सोना, रेशम के वस्त्र पहनना, मोटे कपडे के वस्त्र पहनना, गरम बिछाना बिछाकर बैठना, नारी को आलिंगन करके सोना और मैथुन करना हितकारक है |

हेमंत रुतु में त्याज्य - शीतकाल में लघु अन्नपान, तीव्र एवं सहित वायु सेवन, थोडा भोजन, जल में घुले सत्तू का सेवन, ठन्डे पानी का स्नान एवं स्पर्श, खुल्ले में सोना, आदि त्याज्य है |

इस बारिश की रुतु में स्वस्थ रहने के लिए क्या करे ?

पानी उबल कर पीये या फ़िल्टर पीये .

- सप्ताह में एक दिन उपवास करे अर्थात पेट को आराम दे. दुसरे दिन मुंग का पानी, मुग, खिचड़ी, दाल-चावल, रोटी-सब्जी, इस तरह क्रमश: खाना शुरू करे. अधिक जानकारी के लिए disease-treatment-sam-niram/ देखे.

भोजन के समय विवेक से ठूंस-ठूंस कर न खाए. हमेशा पेट का आधा हिस्सा खाली रखे ! एक चौथाई पानी के लिए और एक चौथाई अवकाश रखे !

- रसोई में अदरक, काली-मिर्च, अजवायन, दालचीनी, सुंठ, लसून, आदि का प्रयोग विशेष करे.

हल्का-सुपाच्य खाना खाये, भारी खाना न खाये. Farmented- खमीरी खाना न खाये.

- हरड और सुंठ एकत्र कर के १ चमच पानी के साथ रोज खाये.

पानी में बार बार न भीगे, अगर भीग जाये तो कपडे जल्द से जल्द बदल कर शरीर को गरम कर दे.

- खुले बदन नहीं रहे, न काम करे, न घुमे. घर में भेज न रहे उसका ख्याल रखे.

मच्छर और अन्य जिव जन्तुओ से बचने का प्रावधान रखे. सूक्ष्म वायरस से रक्षा के लिए गूगल आदि का धुप करे. गंदकी थोड़ी भी न होने दे.

- बीमार व्यक्ति, स्त्री और बच्चो को अपने पैरो को ढककर रखना चाहिए.

 

शरद चर्या : शरद रुतु में सूर्य मंडल में ऐसी व्यवस्था बनती है क़ि, सूर्य पृथ्वी के करीब आता है. जिससे सूर्य की किरणे सीधी रेखामे होती है. जिससे वातावरणमें दिनमे उष्णता ज्यादा होती है और रातमे ठण्ड का प्रमाण होता है. जिससे स्वाभाविक रूपसे पित्त का प्रकोप होकर पित्त जनित व्याधियां ज्यादातर होती है. जैसे क़ि, बुखार, सरदर्द, पीलिया(कामला), दाह, अपच, मन्दाग्नि, भ्रम(चक्कर आना), अतृप्ति, कोथ, उर्ध्वभाग से रक्तस्त्राव, आदि.

इस पित्तजनित व्याधियां से बचने के लिए अच्छी भूख लगने पर ही भोजन करें, तिक्त औषधियां से सिद्ध घृत का पान करना चाहिए. जैसे, महातिक्ताघ्रुत, पंच्तिक्ताघ्रुत, अम्रुताघ्रुत, किरातादिघ्रुत, आदि. खाने में विशेष दूध, चावल, साकर, (इसी लिए शरद पूर्णिमा पर दूध पौआ, श्राद्ध में दूध क़ि खीर की शास्त्र में व्यवस्था है) आमला, आदि का सेवन करना चाहिए. इस पित्तजनित व्याधियां से बचने के लिए खासकर इस रुतुमे विरेचन करना चाहिए, त्रिफला का सेवन करना चाहिए. रक्त से पित्त को बाहर निकालने के लिए रक्तमोक्षण करना चाहिए.

इस रुतु में ठन्डे पानी के फवारे के पास, प्रिय पात्र के साथ, सुगंधी पुष्पों के बिच, शीतल चांदनी रात में विहरना चाहिए और कर्णप्रिय संगीत सुनना चाहिए. शरद रुतु में इस पित्तजनित व्याधियां से बचने के लिए इसी लिए नवरात्री की, शरद पूर्णिमा के रास गरबा की व्यवस्था है. शरीर पर सफ़ेद चन्दन, रक्त चन्दन, अगर, तगर आदि सुगंधी द्रव्यों का लेप करना चाहिए.

इस रुतु में पित्त जनित व्याधियों से बचने के लिए धूप का सेवन, रात्रि देर तक का जागरण, दिन का शयन, क्रोध, चिंता, आदि न करें. भोजन में मांसाहार, अंडा, क्षार, दहीं, खोया की मिठाई, नमकीन चीजें, पचने में भारी चीजें, ज्यादा मिर्चिवाली चीजें, आचार, ज्यादा खट्टी चीजें, ज्यादा तेलवाली चीजें, पिज़ा, बर्गर, चटाकेदार खाना नहीं खाना चाहिए.

 

डायेरिया -Diarrhea.

दिनांक १२ अक्तूबर को हमारे दोस्त जसुभाई का फोन आया, ' वैदराज, डायेरिया हो गया है, डॉक्टर की गोलिओं खायी लेकिन, ठीक नहीं हो रहा...! ' मेने पूछा, ' कितने दिनसे ..? ' उन्होंने बताया, ' दो दिन हो गए...१० - १५ बार जाना पड़ता है और पेट में भी बहुत दर्द होता है...!' मेने जवाब दिया, ' अभी एक चमच सुंठ पानी के साथ खायो और एक टाइम कुछ न खाओ ....फिर शाम को फिर से एक चमच सुंठ खा लेना..! शामको बहुत भूख लगे तो चावल की राब केवल खाना ...! ' दुसरे दिन फिर सुबह में फोन आया, ' अब सब कुछ ठीक है...अबसे खाना खा लु.....? ' मेने कहा, ' नहीं ! पतली खिचड़ी अभी खाओ...फिर..मुंग चावल..मुंग रोटी...इस तरह....धीरे धीरे...खाना शुरू करो...! इस रुतु में पाचन शक्ति मंद होने से डायेरिया होता है...! इसीलिए उपवास करके हलका खाना ले करके ..फिर सामान्य खुराक पर आना चाहिए..! ' कैसा आइडिया है...!

वैद्य मित्र के संपर्क में भी रहो और...स्वस्थ रहो....और....पैसे भी बचाओ .....!

Thank you, With regards,

Vaidyaraj Amrutbhai Prajapati

All treatments are avail here: Ayurvedyog Centre, A-1, Gopur apartment, Kasar falia, Opp. Govt. press, Kothi, Opp. SSG Madical collage, Vadodara. Gujarat. India. Pin: 390001.

Contact: 9327711235, 7874853221. E-mail: ayurvedyog@gmail.com Web: www.ayurvedyog.com/ Face book: http://www.facebook.com/profile.php?id=100000028999027